Monday, November 15, 2010

यूक्लिप्टस

कवि मित्र ने आंखों में आभार झलकाते हुए कहा-‘इस पांडुलिपि में तुमने जिन कमजोर रचनाओं का जिक्र किया है, मुझे भी ठीक नहीं लग रही थीं. अब इनकी जगह दूसरी सशक्त रचनाएं जोड़ दूंगा.
पर तुम इन कमजोर रचनाओं को हर बार मंच पर पढ़ते हो और तुम्हारा कहना है कि ये काफी सराही गईं हैं.’
देखो तुम, मंच पर तो कच्ची-पक्की रचनाएं चल जाती हैं. लेकिन किताब आखिर किताब होती है.’
इतने में चाय आ गई.
लो उठाओ, अबकी चाय का मजा देखो.’ नरेश ने चाय उठाई और धीरे-धीरे सिप करने लगा.
कवि बोला-‘मैं सोच रहा था, अगर तुम महीने में दो-तीन कवि सम्मेलन पकड़ लो तो मैं तुम्हें अच्छा रेट दिलवा दूंगा. तुम्हारी आर्थिक परेशानी कुछ तो हल होगी. यह अखबार वाले तुम्हें समीक्षा काॅलम का क्या देते होंगे!’
नरेश को लगा, कवि मित्र उसकी बेकारी पर दया दिखाना चाह रहा था. वह उठने लगा और चाय का आखिरी घूंट ले उठ खड़ा हुआ-‘मेरे बारे में चिंता करने का धन्यबाद. अब ये पांडुलिपि संभालो, मैं चलता हूं.’
कवि मित्र ने हाथ पकड़कर बैठाते हुए कहा-‘इस किताब की भूमिका लिखने के लिए आचार्य जी ने ‘हां’ कर दी है.’
वही आचार्य जिन्हें सरकार में जेल मंत्री का पद मिला है!’
तुम गलत समझ रहे हो, जेल मंत्री होने से क्या होता है. उनके अंदर का साहित्यकार मर पाएगा. कभी नहीं. मैं तुम्हें इस पांडुलिपि-संशोधन का पूरा पारिश्रमिक दूंगा. मैं चाहता हूं, तुम इस किताब की भूमिका इस तरह लिखो कि लगे आचार्य जी ने लिखी है. कह भी रहे थे कि मेरे नाम से लिखवा लो.’
नरेश यह सुनते ही धक रह गया. वह धीरे-से बोला-‘मेरे पास और बहुत से काम हैं....अच्छा मुझे देर हो रही है.’
उसके जाते ही कवि मित्र बड़बड़ाया-‘भरी थाली में लात मारने वाले लोग इसी तरह पूरी जिंदगी परेशान रहते हैं.’ और वह पांडुलिपि में काटी गई कमजोर रचनाओं को फिर से सही का निशान लगाने लगा.
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

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