Monday, November 1, 2010

रिश्ते

जब वह कमरे में दाखिल हुई तो उसने दिन-भर के आफिस वाले बोझ और परेशानी को चेहरे पर पानी के छींटे डालकर धोया और तौलिये से सुखा डाला. इस तात्कालिक ताजगी वह उमंग से उसने स्टोव जलाया और फ्राईपैन में चाय के अंदाज से पानी डालकर कुछ गुनगुनाने लगी. स्टोव की आवाज सुनकर सामने लैटी मां कराहने लगी
कैसी हो मां?’ उसने चुलबुले किंतु मायूस अंदाज में पूछा. मां ऐसी बातों का जवाब नहीं दिया करती है, उसे मालूम था.
लो मां, चाय. राकेश दवाई दे गया था?’
हां!’ मां बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई और अत्यंत पीड़ा से करवट बदलकर नई-नवेली उमंगों से भरपूर लड़की की तरफ देखकर तनिक मुस्कराई भी.
अभी उठाती हूं.’ कहते ही उसने मां को धीरे उठाकर कमर में कई तकिये लगा दिए.
वह सोचने लगी उस बीमारी के बारे में जो मां को न जिंदा रखना चाहती है, और न मरने देती है. सारा घर दवाई, इंजेक्शन और कैप्सूल की खाली शीशियों से भरता जा रहा था.
राकेश पर्चा रख गया है, वहां तेरी अलमारी में.’ मां धीरे-से काफी देर में कह पाती है. पर्चा पढ़ते ही उसके चेहरे पर लाज भरी मुस्कान फैल गई. आज कितने दिनों के बाद राकेश रात को रुकेगा.
ये बातें तुम मेरे सामने कह सकते थे, पर्चे में लिखने की क्या जरूरत थी!’ वह कुछ हल्के मूड में थी.
ठीक है, मैं कमाता नहीं हूं पर अभी इतनी हैसियत तो है कि दवाई ला सकूं. तुम्हारी तो सारी तनख्वाह ही दवाई में चली जाती है. पार्टी-पाॅलिटिक्स ने मुझे न घर का रखा है, न बाहर का. फिर भी तुमने इस नाकारा को. जिसे लोग आवारा और शराबी कहते हैं. अम्मा जी की सेवा करने का मौका दिया, यह क्या कम है?’ ऐसे अंदाज पर वह मुस्कराकर रह जाती है.
जीरो वाट का बल्ब जल रहा है. एक ख्याल उसे मां की बीमारी से ज्यादा भयानक लगता है, जो रोज रात को परेशान करता है. उसका गला सूखने लगा. पास रखी सुराही को देखकर वह तृष्णा लिए उठी और बराबर के पार्टीशन में गई.
खटोले पर सोया राकेश, ढाढ़ी भरा चेहरा. सीने के बटन खुले हुए. उससे चार वर्ष छोटा. क्या लगता है उसका? सब कुछ तो लगता है उसका. वही है अब उसकी जिंदगी. उसके जी में आया कि वह झकझोरकर कहे
राकेश तुम मुझे अपना लो. मैं टूट रही हूं. मां ठीक नहीं होगी....मां ठीक नहीं होगी.
क्या बात है दीदी?’ राकेश हड़बड़ाकर जाग गया. उसने परेशान अरुणा के चेहरे को पसीने से तर-बतर पाया.
कुछ नहीं रे, तू सो जा. मां की दवाई का टाइम हो गया है न...’ और वह पलट पड़ी.
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

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