Sunday, October 10, 2010

लघुकथा के लिए निरंतर संघर्षरत: जगदीश कश्यप

साहित्य-क्षेत्र में किसी विधा की प्रतिस्थापना के लिए न केवल रचनात्मक स्तर पर, प्रत्युत उसे शिल्प-विधान एवं उन्नयन हेतु नित नई योजनाओं के माध्यम से निरंतर जुटे रहना सामान्य बात नहीं है. फिर भी, समर्पित मुद्रा में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जूझते रहते हैं. सफलता और व्यक्तिगत मान्यता उनके लिए उतना महत्त्व नहीं रखती, जितना अपनी मुहिम में जुटे रहने का निष्ठा-भाव. ऐसे विरले व्यक्ति की श्रेणी में जगदीश कश्यप का नामोल्लेख लघुकथा के लिए उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों के संदर्भ में किया जाए तो उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना ही होगा.
जगदीश कश्यप, आधुनिक लघुकथा की विकास-यात्रा के प्रथम साक्ष्य रहे हैं. लघुकथा के रचनात्मक पक्ष को समग्र रूप में सामने लाने के लिए उन्होंने उल्लेखनीय प्रयास किए. ‘मिनीयुग’ पत्रिका में लघुकथाओं का प्रकाशन तथा कालांतर में इसी पत्रिका के माध्यम से लघुकथा के लिए अपनी लघुकथा के लिए अपनी महत्त्वपूर्ण सेवाएं देने वाले रचनाकारों के रचनात्मक पक्ष का लेखा-जोखा, अन्यत्र प्रकाशित लघुकथाओं का मूल्यांकन, कृतियों पर तल्ख तथा सराहनीय टिप्पणियां, विशेषांकों के माध्यम से लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर चर्चा, प्रस्तुत की गई. कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं के सौजन्य संपादक के रूप में भी जगदीश कश्यप ने यह कर्तव्य निभाया. ‘छोटी-बड़ी बातें’ महावीर जैन के साथ संपादित प्रथम ऐसा महत्त्वपूर्ण संकलन रहा, जिसमें देश के प्रत्येक हिस्से से युवा लोग लघुकथा लेखन से जुड़े. रचनाकारों की रचनाधर्मिता को सामने लाने का प्रयास हुआ. संवेदना के स्तर पर लघुकथाएं लिखी जा सकती हैं, इसका गवाह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ के बाद प्रकाशित यह दूसरा संग्रह था. लघुकथा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने के लिए जगदीश कश्यप ने विभिन्न ग्रंथालयों में अध्ययन-चिंतन-मनन किया. उन्होंने सर्वप्रथम इस प्रकार के लेख लिखने की परंपरा प्रारंभ की. लघुकथा की रचनात्मकता को नकारने तथा लेखन पर प्रश्न-चिह्न लगाने वाले आलोचकों के विरुद्ध मोर्चाबंदी में वे प्रथम पंक्ति में रहे हैं. अन्य भाषाओं तथा लोकजीवन से जुड़ी लघुकथाओं को पाठकों तक पहुंचाने का श्रेय भी जगदीश कश्यप को जाता है.
रचनाकार के रूप में जगदीश कश्यप का योगदान असंदिग्द्ध है. ‘कैथल दर्पण’ द्वारा प्रकाशित लघुकथा विशेषांक में सम्मिलित उनकी रचना पाठकीय स्तर पर श्रेष्ठ घोषित होना, उनकी लेखनी की प्रभावात्मक क्षमता को सामने लाता है. जगदीश कश्यप ने अपनी लघुकथाओं के कथ्यों में सामान्यतः पारिवारिक, सामाजिक या राजनैतिक विसंगतियों से जूझ रहे व्यक्ति की क्षणिक मानसिकता को किल्क करने का प्रयास किया है. ‘पूत-कपूत’, ‘नागरिक’ आदि लघुकथाओं में युवा पीढ़ी की विवशता व्यक्त हुई है, तो ‘अंतिम गरीब’ में आजादी की असलियत. ‘चादर’, ‘दर्पकाल’, ‘चतुर प्रेमिका’ जैसी लघुकथाएं उनके विभिन्न स्तरों के सोच तथा दृष्टिकोण को बड़े ही सहज ढंग से व्यक्त करती हैं.
जगदीश कश्यप की लघुकथाओं मे उनका व्यापक अनुभव एवं कसमसाता हुआ आक्रोश व्यक्त हुआ है. कहीं अंत किसी अच्छी कहानी का प्रभाव छोड़ जाता है‘पीपल बाबा शांत खड़े हैं. विशाल पीपल पर पक्षियों का शोर हो रहा है. गोधूलि का समय है, गाय-भैंस जंगल से लौट रही हैं. और उसने आसुंओं को चुप पोंछ डाला है, यह जानकर कि कहीं कोई देख न ले. संभवतः उनकी ऐसी लघुकथाएं, उन्हीं के दावे कि ‘लघुकथा ठीक कहानी जैसी तात्विक क्षमताएं रखती है और उतना ही परमानंद देने में समर्थ है....’ का सार्थक प्रत्युत्तर हैं.
सतीश दुबे
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से





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