Wednesday, November 3, 2010

रिंग मास्टर

चपरासी के चेहरे पर संतोष के साथ-साथ एक प्रकार की विजय मुस्कान थी. बड़ा बाबू बोला—‘ले आया डीएम से फाइल!’
चपरासी के हाथ से पत्रावली लेकर वह उसको पढ़ने लगा, ‘भाई तेरे आदेश तो काफी बढ़िया हैं. डीएम साहब ने तुझे तीनों आरोपों से बरी कर दिया है.’
चपरासी सुरेश कुछ नहीं बोला तो बड़े बाबू ने कहा, ‘हमने तो साहब से कह दिया था कि तेरे लड़के की तबियत खराब थी, वरना तू तो ड्यूटी का पक्का पाबंद है.’
सुरेश के जी में आया कि वह बड़े बाबू का मुंह नोंच ले. इसी ने सस्पेंशन की रिपोर्ट बनाकर साहब के आगे पेश की थी. आरोप यह था कि सेक्रेट्री साहब के प्रोग्राम में इंस्पेक्शन हाउस पर सुरेश की ड्यूटी लगाई थी और वह वहां पहुंच नहीं सका था, यद्यपि सेक्रेटरी साहब वहां ठहरे नहीं थे और कार से दिल्ली चले गए थे. पर इसे चपरासी की हुक्म-उदूली माना गया.
अब क्या सोचने लगा, जा. अब तो तेरा काम हो गया. अच्छा ऐसा कर चार-पांच चाय ले आ.’
पर बड़े बाबू, दस महीने हो गए हैं. आपने मेरी निलंबन काल की एक बटा तीन तनख्वाह भी नहीं निकाली है. मेरे पास चाय के पैसे कहां से आए!’
अबे, तेरे पैसों की चाय पीकर हमें पाप लगाना है! ये ले पांच का नोट..!’ बड़ा बाबू किलस गया था.
चाय सुड़कता हुआ बड़ा बाबू बोला, ‘अब चिंता मत कर, जिला अधिकारी ने तुझे सवेतन बहाल किया है.’
सारी मेहरबानी आपकी है बड़े बाबू. दूध, बनिये और बच्चों की स्कूल की फीस, सब उधार लेकर काम चलाया है. बच्चा बड़ी मुश्किल में है. पूरे आठ हजार खर्च हो गए, उसके इलाज में.’
ठीक है भई सुन लिया, अब तू घर जा. तेरा काम जल्दी कर दूंगा.’
चपरासी के जाते ही बड़ा बाबू एकाउंटेंट व डिस्पेचर की ओर मुखातिब हुआ—
साला हमसे बहस करता है, आ गई अकल ठिकाने! कहता था साहब के घर काम नहीं करूंगा. अबे हम भी तो साहब के घर सब्जी ले जाते हैं. अभी इसे इतनी जल्दी वेतन नहीं लेने दूंगा.’
ऐसा कहते ही उसने चपरासी की बहाली वाली फाइल को अलमारी में रखा और धड़ाक से बंद कर दी और एकाउंटेंट से बोला—‘आज जरा बच्चे की तबियत खराब है, कल शायद न आऊं!’
क्या हुआ बच्चे को?’ एकाउंटेंट ने बनावटी चिंता दिखाई.
होना क्या है, बच्चों को सर्कस दिखाना है. आखिरी दिन है कल वरना सर्कस का पास बेकार हो जाएगा.’ यह कहते ही बड़ा बाबू खिसियानी हंसी लिए उठा और बोला—
अभी आया, जरा टायलेट हो आऊं.’
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

Tuesday, November 2, 2010

उल्टा पाठ

फूलो ने भी अपना दुखड़ा सुनाना शुरू किया, ‘मेरे आदमी का यही कसूर था कि उसने हक की आवाज उठाई थी. उस पर इल्जाम है कि उसने फैक्ट्री में आग लगवाई और मजदूरों को भड़काया. छह महीने से ऊपर हो चुके हैं. फैक्ट्री खुल चुकी है. हड़ताली काम पर चले गए हैं, पर मेरा आदमी अब भी जेल में है.
एक अधेड़ औरत जिसके हाथ में मनके की माला थी, फिराते हुए बोली‘सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दो बहन, वह जो करता है, ठीक करता है.’
इसपर फूलो किलस गई‘क्या खाक ठीक करता है. मैं तीन महीने से व्रत रखती आ रही हूं. और बराबर प्रसाद चढ़ाती हूं. लगता है, बाबा हनुमान कारखाना मालिक की तरफ हो गए हैं. नहीं तो बाबा को क्या नहीं मालूम कि मेरा आदमी बेकसूर है.’
यह सुनकर फजलु की बीबी बोली‘सच्ची कह रई हो बहन. मेरा खाविंद दंगों में हाथ ठेला लेकर गया था. मैंने मना करा पर उससे बच्चों की भूख नहीं देखी गई. अब तक मैं कमाल खां पर तीन चद्दरें चढ़ा चुकी हूं. पर लगता है कि कमाल साब अमीरों की चीजें ज्यादा पसंद करते हैं. अल्लाह के हुजूर में ये कैसा अंधेर!’
उन औरतों के बीच एक मैली-कुचैली बूढ़ी, जिसकी कमर समय ने झुका दी थी, लाठी के सहारे खड़ी अत्यंत धीमी आवाज में खरखराई
तुम दोनों कलट्टर की कोठी पे जाके बैठ जाओ. अन्न-जल छोड़ दो. गांधी बाबा ने फिरंगियों को इसी तरह भगाया था.’
अरे, यह भिखारिन कैसा उल्टा पाठ पढ़ा रही है.’ कई औरतें चिल्लाईं, ‘चल भाग यहां से!’
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

Monday, November 1, 2010

रिश्ते

जब वह कमरे में दाखिल हुई तो उसने दिन-भर के आफिस वाले बोझ और परेशानी को चेहरे पर पानी के छींटे डालकर धोया और तौलिये से सुखा डाला. इस तात्कालिक ताजगी वह उमंग से उसने स्टोव जलाया और फ्राईपैन में चाय के अंदाज से पानी डालकर कुछ गुनगुनाने लगी. स्टोव की आवाज सुनकर सामने लैटी मां कराहने लगी
कैसी हो मां?’ उसने चुलबुले किंतु मायूस अंदाज में पूछा. मां ऐसी बातों का जवाब नहीं दिया करती है, उसे मालूम था.
लो मां, चाय. राकेश दवाई दे गया था?’
हां!’ मां बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई और अत्यंत पीड़ा से करवट बदलकर नई-नवेली उमंगों से भरपूर लड़की की तरफ देखकर तनिक मुस्कराई भी.
अभी उठाती हूं.’ कहते ही उसने मां को धीरे उठाकर कमर में कई तकिये लगा दिए.
वह सोचने लगी उस बीमारी के बारे में जो मां को न जिंदा रखना चाहती है, और न मरने देती है. सारा घर दवाई, इंजेक्शन और कैप्सूल की खाली शीशियों से भरता जा रहा था.
राकेश पर्चा रख गया है, वहां तेरी अलमारी में.’ मां धीरे-से काफी देर में कह पाती है. पर्चा पढ़ते ही उसके चेहरे पर लाज भरी मुस्कान फैल गई. आज कितने दिनों के बाद राकेश रात को रुकेगा.
ये बातें तुम मेरे सामने कह सकते थे, पर्चे में लिखने की क्या जरूरत थी!’ वह कुछ हल्के मूड में थी.
ठीक है, मैं कमाता नहीं हूं पर अभी इतनी हैसियत तो है कि दवाई ला सकूं. तुम्हारी तो सारी तनख्वाह ही दवाई में चली जाती है. पार्टी-पाॅलिटिक्स ने मुझे न घर का रखा है, न बाहर का. फिर भी तुमने इस नाकारा को. जिसे लोग आवारा और शराबी कहते हैं. अम्मा जी की सेवा करने का मौका दिया, यह क्या कम है?’ ऐसे अंदाज पर वह मुस्कराकर रह जाती है.
जीरो वाट का बल्ब जल रहा है. एक ख्याल उसे मां की बीमारी से ज्यादा भयानक लगता है, जो रोज रात को परेशान करता है. उसका गला सूखने लगा. पास रखी सुराही को देखकर वह तृष्णा लिए उठी और बराबर के पार्टीशन में गई.
खटोले पर सोया राकेश, ढाढ़ी भरा चेहरा. सीने के बटन खुले हुए. उससे चार वर्ष छोटा. क्या लगता है उसका? सब कुछ तो लगता है उसका. वही है अब उसकी जिंदगी. उसके जी में आया कि वह झकझोरकर कहे
राकेश तुम मुझे अपना लो. मैं टूट रही हूं. मां ठीक नहीं होगी....मां ठीक नहीं होगी.
क्या बात है दीदी?’ राकेश हड़बड़ाकर जाग गया. उसने परेशान अरुणा के चेहरे को पसीने से तर-बतर पाया.
कुछ नहीं रे, तू सो जा. मां की दवाई का टाइम हो गया है न...’ और वह पलट पड़ी.
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

Friday, October 29, 2010

दयालु लोग

टीवी एंटीना पर बैठी एक चिड़िया दूसरी चिड़िया से बोली
आज का आदमी बड़ा दयालु हो गया है. वह जानता है कि हम दिन भर उड़ती-फिरती थक जाती होंगी, इसलिए उसने हम लोगों के आराम करने के लिए छतों पर स्टेंड लगवा दिए हैं.’
तू बड़ी भोली है बहन,’ दूसरी चिड़िया ने कहा‘ये हमारे बैठने का स्टेंड नहीं है. ये तो आदमी को मजबूरी में लगाना पड़ा है. इसकी सहायता से आदमी अपने टेलीविजन सैट पर फोटो आदि देखता है, जैसे लोग सिनेमा में देखते हैं.’
तू यह सब कैसे जानती है, बहन? मुझे तेरी बात पर यकीन नहीं आता.’
अच्छा चल, मैं तुझे एक करिश्मा दिखाऊं. मैं तुझे एक कोठी में ले चलती हूं.’
दोनों चिड़िया रोशनदान के रास्ते से कोठी के उस कमरे में पहुंची जहां वीडियो कैसेट चल रहा था. विशिष्ट लोग ऐसा दृश्य देख रहे थे, जिसमें एक लड़की से बलात्कार किया जा रहा था.
दोनों चिड़िया की टीबी...टुट-टुट और फड़फड़ाहट से विशिष्ट लोगों के आनंद में बाधा पड़ रही थी. उनमें एक, शायद वह मिल-मालिक का लड़का था, बोला‘इन हरामजादियों को यहां से भगाओ!’
इसपर एक कालिजिएट लड़की उठी. उसने अपने गले के दुपट्टे से उन दोनों चिड़िया को भगाना चाहा. दोनों चिड़िया घबराकर बाहर निकल आईं.
पहली चिड़िया दूसरी से बोली‘तू ठीक कहती है, बहन, आज का आदमी दयालु नहीं, बड़ा दुष्ट हो गया है.’
प्रस्तुति: विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से 

Wednesday, October 27, 2010

सुखी आदमी

मैं अपनी गंदी सड़ियल कोठरी में घुसा ही था कि दो पुरुषों के बीच दो युवतियों को बैठे देखा. इन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था, अलबत्ता इनका पहनावा ऐसा ही था, जैसा भिखारियों का होता है और हम जिन्हें अमूमन भीख देने के नाम पर दुत्कार देते हैं. टूटे हुए स्टूल पर मेरे बैठते ही युवती बोली
मैं स्पष्टवादिता हूं, तुम अपने अखबार में जिस तरह मेरा उपयोग करते हो, उसी का परिणाम है कि लोग तुमसे चिढ़ गए हैं और तुम्हें विज्ञापन मिलने बंद हो गए हैं.’
तुरंत बाद ही एक पुरुष बोला‘मेरा नाम सीधापन है. मैं तुम्हारे साथ हूं. इसलिए लोग तुम्हें बेबकूप समझते हैं और तुम्हारा शोषण हो रहा है.’
दूसरी युवती ने कहा‘मैं ईमानदारी हूं. जब तक मैं तुम्हारे साथ रहूंगी, तब तक तुम्हें सच्ची खबर छापने के एवज में कोई सरकारी अधिकारी घास तक न डालेगा, जबकि दूसरे लोग झूठी खबर छापते हुए इन अधिकारियों को ब्लैकमेल कर मालामाल हुए जा रहे हैं.’
मैं परिश्रम हूं.’ अंतिम अतिथि ने परिचय देते हुए कहा‘रात दिन अथक भागदौड़ के बावजूद तुम्हें दो जून का खाना भी ढंग से नसीब नहीं होता, इसलिए हम सबने सोचा है कि तुम्हारी हालत पर रहम किया जाए, ताकि तुम पर नाकारा, अयोग्य और सनकी जैसे आरोप न लग सकें.’
एक क्षण को तो मैं उनकी बात पर स्तब्ध रह गया. मैं तुरंत संभल गया और धीरे-से बोला‘तुम सबके कारण ही मेरी शहर में इतनी इज्जत है. मैं कथा-कविताएं लिख-लिखकर अपने बाल-बच्चों का पेट पाल रहा हूं. आप मुझे छोड़कर चले जाएंगे, जब मैं एक दिन भी जीवित नहीं रह सकता.’
मेरे निकलते आंसू देखकर चारों कुछ सोचने लगे. इसके बाद परिश्रम ने कहा
हम तुम्हारे साथ रहने को तैयार हैं. बशर्ते तुम अखबार निकालना बंद कर दो. इस तरह प्रेस वाला तुम्हें बार-बार अपमानित नहीं करेगा. क्योंकि वह जानता है कि तुम समय पर कागज और प्रिंटिंग चार्ज नहीं चुका पाते हो. तुम जमकर कथा/कविता लिखो, फिर देखो हम तुम्हारा कैसा नाम चमकाते हैं.’
दोस्तो!’ मैंने तुरंत कहा‘ना तो मैं अखबार बंद करूंगा और न ही कथा-कविता लिखना छोड़ रहा हूं. तुम्हें मेरे कारण कष्ट हो तो मुझे छोड़कर जा सकते हो.’
हम तुम्हारी दृढ़ता पर अत्यंत मुग्ध हैं. अब तुम्हारे घर में स्थायी रूप से निवास करेंगे. और मरते दम तक तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे.’
तभी हर व्यक्ति धुआं बनने लगा. कोई मेरे मुंह, कोई नाक, कोई आंख व कान के रास्ते मुझमें समा गया. मुझे लगा कि मुझमें अतिरिक्त शक्ति पैदा होने लगी है....और मैं संसार का सबसे सुखी आदमी हूं.’
प्रस्तुति : विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

Monday, October 25, 2010

उनका दर्द

उस रात धवल चांदनी में नहा रहा एक पत्थर बोला
बहन शिला, किसान नहीं जानते कि उस खंडहर महल और हम पर देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कितना कुछ छापा है. विदेशी विद्वान कितनी मुसीबतें उठाकर यहां तक आते हैं और हम पर खुदे लेखों को कितनी सावधानी से पढ़ने की कोशिश करते हैं या फोटो उतारते हैं.’
शिला बोली‘भाई मेरे , इस गुमटी के आसपास उस वक्त भी खेती होती थी, जब हमें यहां पर राजा की आज्ञा से उसकी यशोगाथा खुदवाकर गाढ़ा गया था. आज इन बातों को हजारों साल बीत गए हैं. उस राजा के जमाने में भी किसान रोता था, और आज भी ये लोग रोते हैं. जबकि अनेक किसान समर्थक नेता और राजनीतिक लोग इनके समर्थन में जुलूस और रैली आयोजित करते रहते हैं.’
हां, ये चमत्कार क्या है बहन? आज खेती करना कितना आसान हो गया है. ट्रेक्टर , खाद, बीज, थ्रैशर, बिजली-पानी की सुविधा आज के किसान को उपलब्ध है. फिर इनके रोने का कारण क्या है?’
इस पर शिला कुछ सोचते हुए बोली‘खेती चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, पर गरीब किसान वही हल-बैल से आगे नहीं बढ़ पाएगा. सच में इनकी नियति हमारी तरह है. शासक आएंगे, चले जाएंगे, पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये लोग ऐसे ही रहेंगे जैसे कि हम. क्या कभी किसान के नाम का पत्थर या शिलाखंड कहीं गाढ़ा गया है, जिसपर किसान के दुख और कष्ट उकेरे गए हों!’
तभी चंद्रमा के मुख पर काले बादल छा गए और उस घोर अंधकार में पत्थर कुछ सोचने लगा.

प्रस्तुति : विनायक
कदम-कदम पर हादसे’ से

Sunday, October 24, 2010

जगदीश कश्यप की लघुकथाएं: आखिरी खंबा

जगदीश कश्यप की लघुकथाएं: आखिरी खंबा: "शहर के अंतिम सिरे पर लगे बिजली के खंभे ने एक सुनसान रात को नगर के फैशनेबल इलाके में स्थित खंभे से तार के माध्यम से पूछा— ‘कहो यार, कुछ तो स..."