Wednesday, November 17, 2010

शहतूत

सब ओर से हताश-निराश पोस्ट ग्रेजुएट बेरोजगार शहतूत के पेड़ के नीचे आकर बैठ गया और उस इंटरव्यू के बारे में सोचने लगा, जो उसके जैसे लोगों का वक्त बरबाद करने से ज्यादा कुछ नहीं था. उसे घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी. वह मां-बाप के लिए आम नहीं बबूल का पेड़ सिद्ध हुआ था. एकाएक उसको शोर सुनाई दिया—
‘यों निराश होकर बैठने से तुम अपने शरीर और मन को बीमार बना रहे हो. मुझे देखो, सर्दी-गर्मी-बरसात सब सहता हूं. अभी-अभी स्कूली बच्चों को तुमने देखा होगा. मुझ पर लगे कच्चे-पक्के शहतूतों को पाने के लिए मुझपर पत्थर मार रहे थे. मुझे उन बच्चों से बड़ा प्यार है. तुम अपने से प्यार करना सीखो. मेरा धर्म तो फलना है और दूसरों को देना ही देना है. फल न लगे तो कौन मेरी परवाह करेगा! उठो, अपने शरीर को फलदायक बनाओ.’
एकाएक उसको लगा कि उसके अंदर कोई शहतूत का वृक्ष उगने लगा है. वह एक नए निश्चय के साथ उठा. जहां चलने लगा तो उसने देखा कि शहतूत के वृक्ष की डालियां झूमने लगी थीं...मानो उसको आशीर्वाद दे रही हों.

प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से





Monday, November 15, 2010

यूक्लिप्टस

कवि मित्र ने आंखों में आभार झलकाते हुए कहा-‘इस पांडुलिपि में तुमने जिन कमजोर रचनाओं का जिक्र किया है, मुझे भी ठीक नहीं लग रही थीं. अब इनकी जगह दूसरी सशक्त रचनाएं जोड़ दूंगा.
‘पर तुम इन कमजोर रचनाओं को हर बार मंच पर पढ़ते हो और तुम्हारा कहना है कि ये काफी सराही गईं हैं.’
‘देखो तुम, मंच पर तो कच्ची-पक्की रचनाएं चल जाती हैं. लेकिन किताब आखिर किताब होती है.’
इतने में चाय आ गई.
‘लो उठाओ, अबकी चाय का मजा देखो.’ नरेश ने चाय उठाई और धीरे-धीरे सिप करने लगा.
कवि बोला-‘मैं सोच रहा था, अगर तुम महीने में दो-तीन कवि सम्मेलन पकड़ लो तो मैं तुम्हें अच्छा रेट दिलवा दूंगा. तुम्हारी आर्थिक परेशानी कुछ तो हल होगी. यह अखबार वाले तुम्हें समीक्षा काॅलम का क्या देते होंगे!’
नरेश को लगा, कवि मित्र उसकी बेकारी पर दया दिखाना चाह रहा था. वह उठने लगा और चाय का आखिरी घूंट ले उठ खड़ा हुआ-‘मेरे बारे में चिंता करने का धन्यबाद. अब ये पांडुलिपि संभालो, मैं चलता हूं.’
कवि मित्र ने हाथ पकड़कर बैठाते हुए कहा-‘इस किताब की भूमिका लिखने के लिए आचार्य जी ने ‘हां’ कर दी है.’
‘वही आचार्य जिन्हें सरकार में जेल मंत्री का पद मिला है!’
‘तुम गलत समझ रहे हो, जेल मंत्री होने से क्या होता है. उनके अंदर का साहित्यकार मर पाएगा. कभी नहीं. मैं तुम्हें इस पांडुलिपि-संशोधन का पूरा पारिश्रमिक दूंगा. मैं चाहता हूं, तुम इस किताब की भूमिका इस तरह लिखो कि लगे आचार्य जी ने लिखी है. कह भी रहे थे कि मेरे नाम से लिखवा लो.’
नरेश यह सुनते ही धक रह गया. वह धीरे-से बोला-‘मेरे पास और बहुत से काम हैं....अच्छा मुझे देर हो रही है.’
उसके जाते ही कवि मित्र बड़बड़ाया-‘भरी थाली में लात मारने वाले लोग इसी तरह पूरी जिंदगी परेशान रहते हैं.’ और वह पांडुलिपि में काटी गई कमजोर रचनाओं को फिर से सही का निशान लगाने लगा.
प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से

Sunday, November 14, 2010

टोटका

तीनों ही रचनाएं बेहद कमजोर थीं. संपादक ने एक नजर में रिजेक्ट मार्क कर, वापसी वाली फाइल में रख दिया. इतनी ढेर सारी रचनाओं में कुल दस-पंद्रह रचनाएं ही उसे काम की लगी थीं.
अचानक उसे कुछ ध्यान आया. अभी-अभी उसने तीन रचनाएं रिजेक्ट की थीं. संपादक के नाम पत्र के लेखक ने एक कोने पर लिखा था-‘ओम गणेशाय नमः.’
उसने फाइल को खोला और तीनों रचनाओं को फिर से पढ़ा. विशेषाक के लिए तीनों ही रचनाएं बेकार थीं. उसने फिर से उन रचनाओं को फाइल में रख दिया.
‘क्या हो रहा है इन लेखकों को, वही घिसे-पिटे पुराने कथानक और लचर शैली.’ संपादक खुद बड़बड़ाने लगा.
उसे अचंभा था कि लेखक ने ‘ओम नमः शिवाय’ लिखकर आखिर क्या सिद्ध करना चाहता था. क्या यह लिख देने से रचनाएं सशक्त हो जाएंगीं. ‘नहीं बिलकुल नहीं!’ वह विशेषांक में कोई हल्की चीज नहीं आने देगा. उसके जी में आया कि वह संपादक को लिखे पत्र को पूरा पढ़े. उसने फिर से फाइल खोली और पत्र पढ़ने लगा-‘संपादक जी, आपके विशेषांक हेतु तीन रचनाएं संलग्न कर रहा हूं. इनमें कोई कमी हो तो आपको ठीक करने का पूरा अधिकार है. आप जी तो नए लेखकों को सदा प्रोत्साहन देते हैं.’
पत्रा के कोने पर उसनकी नजर ‘ओम गणेशाय नमः’ पर पड़ी और उसके सामने गणपति बाबा मोरिया की तस्वीर साकार हो उठी. उसका मन श्रद्धा से भर उठा.
अचानक उसने कुछ सोचा और विशेषांक हेतु तीसरी रचना को ठीक करने लगा.

प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से 

Monday, November 8, 2010

दायित्वबोध

विशाल बादलों का झुंड सारी रात चलता रहा और देश के जंगल के ऊपर छा गया.
बादलों ने खबर भिजवाई कि पेड़ों को विनाश से बचाने के लिए बहुत सारे देशों के लोग एक जगह एकत्रित हुए हैं.
‘ये तो बड़ी अच्छी खबर है, बादल भाई.’ विशाल बरगद ने झूमते हुए कहा. इतने में पक्षी भी चहचहाने लगे. हिरन कुलांचे भरने लगे. मोर नाचने लगे. और जलमुर्गियां प्राकृतिक झील में किल्लोल करने लगीं.
तभी बादलों ने देखा कि अनेक लोग कुल्हाड़ियों और आरियों सहित जंगल में घुस गए हैं, ‘हे वृक्ष मित्रो! सावधान, कुछ हत्यारे जंगल में आप पर हमला करने के लिए घुस आए हैं.’
वृक्षों ने असहाय भाव से बादलों की ओर देखा. पशु-पक्षी डरते हुए जहां-तहां दुबकने लगे.
‘साथियो चलो, अपना काम शुरू करो.’ बादल क्रुद्ध हो उठे. घनघोर बारिश शुरू हो गई. मोटे-मोटे ओले गिरने लगे. बिजली कौंधने लगी.
‘इस मौसम में और ऐसी बरसात, मैंने कभी नहीं देखी.’ फारेस्ट गार्ड ने बीड़ी का कश मारते हुए कहा. जंग के पेड़ सांय-सांय कर रहे थे. एकाएक बिजली चमकी और कुछ ही क्षणों में धड़ाम की आवाज पूरे जंगल में गूंज गई.
‘अच्छा मित्रो! हम चलते हैं. हमने अपना काम कर दिया है.’ फिर एक-एक कर बादल छितराने लगे.
बाद में घने जंगल के फारेस्ट गार्डों को छह-सात जली हुई लाशें मिलीं. कुल्हाड़ियां और आरियां इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं. जंगल के अन्य पेड़ उस वृक्ष की प्रशंसा कर रहे थे, जिसे चीरती हुई बिजली हत्यारों तक पहुंची थी. यद्यपि पेड़ काफी घायल हो चुका था. लेकिन उसका एक तना अब भी गर्व से खड़ा हुआ अपनी डालियों के पत्तों को हवा में मंद-मंद लहरा रहा था. मानो जाते हुए बादलों का शुक्रिया अदा कर रहा हो.
प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से 

Wednesday, November 3, 2010

रिंग मास्टर

चपरासी के चेहरे पर संतोष के साथ-साथ एक प्रकार की विजय मुस्कान थी. बड़ा बाबू बोला—‘ले आया डीएम से फाइल!’
चपरासी के हाथ से पत्रावली लेकर वह उसको पढ़ने लगा, ‘भाई तेरे आदेश तो काफी बढ़िया हैं. डीएम साहब ने तुझे तीनों आरोपों से बरी कर दिया है.’
चपरासी सुरेश कुछ नहीं बोला तो बड़े बाबू ने कहा, ‘हमने तो साहब से कह दिया था कि तेरे लड़के की तबियत खराब थी, वरना तू तो ड्यूटी का पक्का पाबंद है.’
सुरेश के जी में आया कि वह बड़े बाबू का मुंह नोंच ले. इसी ने सस्पेंशन की रिपोर्ट बनाकर साहब के आगे पेश की थी. आरोप यह था कि सेक्रेट्री साहब के प्रोग्राम में इंस्पेक्शन हाउस पर सुरेश की ड्यूटी लगाई थी और वह वहां पहुंच नहीं सका था, यद्यपि सेक्रेटरी साहब वहां ठहरे नहीं थे और कार से दिल्ली चले गए थे. पर इसे चपरासी की हुक्म-उदूली माना गया.
‘अब क्या सोचने लगा, जा. अब तो तेरा काम हो गया. अच्छा ऐसा कर चार-पांच चाय ले आ.’
‘पर बड़े बाबू, दस महीने हो गए हैं. आपने मेरी निलंबन काल की एक बटा तीन तनख्वाह भी नहीं निकाली है. मेरे पास चाय के पैसे कहां से आए!’
‘अबे, तेरे पैसों की चाय पीकर हमें पाप लगाना है! ये ले पांच का नोट..!’ बड़ा बाबू किलस गया था.
चाय सुड़कता हुआ बड़ा बाबू बोला, ‘अब चिंता मत कर, जिला अधिकारी ने तुझे सवेतन बहाल किया है.’
‘सारी मेहरबानी आपकी है बड़े बाबू. दूध, बनिये और बच्चों की स्कूल की फीस, सब उधार लेकर काम चलाया है. बच्चा बड़ी मुश्किल में है. पूरे आठ हजार खर्च हो गए, उसके इलाज में.’
‘ठीक है भई सुन लिया, अब तू घर जा. तेरा काम जल्दी कर दूंगा.’
चपरासी के जाते ही बड़ा बाबू एकाउंटेंट व डिस्पेचर की ओर मुखातिब हुआ—
‘साला हमसे बहस करता है, आ गई अकल ठिकाने! कहता था साहब के घर काम नहीं करूंगा. अबे हम भी तो साहब के घर सब्जी ले जाते हैं. अभी इसे इतनी जल्दी वेतन नहीं लेने दूंगा.’
ऐसा कहते ही उसने चपरासी की बहाली वाली फाइल को अलमारी में रखा और धड़ाक से बंद कर दी और एकाउंटेंट से बोला—‘आज जरा बच्चे की तबियत खराब है, कल शायद न आऊं!’
‘क्या हुआ बच्चे को?’ एकाउंटेंट ने बनावटी चिंता दिखाई.
‘होना क्या है, बच्चों को सर्कस दिखाना है. आखिरी दिन है कल वरना सर्कस का पास बेकार हो जाएगा.’ यह कहते ही बड़ा बाबू खिसियानी हंसी लिए उठा और बोला—
‘अभी आया, जरा टायलेट हो आऊं.’
प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से

Tuesday, November 2, 2010

उल्टा पाठ

फूलो ने भी अपना दुखड़ा सुनाना शुरू किया, ‘मेरे आदमी का यही कसूर था कि उसने हक की आवाज उठाई थी. उस पर इल्जाम है कि उसने फैक्ट्री में आग लगवाई और मजदूरों को भड़काया. छह महीने से ऊपर हो चुके हैं. फैक्ट्री खुल चुकी है. हड़ताली काम पर चले गए हैं, पर मेरा आदमी अब भी जेल में है.
एक अधेड़ औरत जिसके हाथ में मनके की माला थी, फिराते हुए बोली—‘सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दो बहन, वह जो करता है, ठीक करता है.’
इसपर फूलो किलस गई—‘क्या खाक ठीक करता है. मैं तीन महीने से व्रत रखती आ रही हूं. और बराबर प्रसाद चढ़ाती हूं. लगता है, बाबा हनुमान कारखाना मालिक की तरफ हो गए हैं. नहीं तो बाबा को क्या नहीं मालूम कि मेरा आदमी बेकसूर है.’
यह सुनकर फजलु की बीबी बोली—‘सच्ची कह रई हो बहन. मेरा खाविंद दंगों में हाथ ठेला लेकर गया था. मैंने मना करा पर उससे बच्चों की भूख नहीं देखी गई. अब तक मैं कमाल खां पर तीन चद्दरें चढ़ा चुकी हूं. पर लगता है कि कमाल साब अमीरों की चीजें ज्यादा पसंद करते हैं. अल्लाह के हुजूर में ये कैसा अंधेर!’
उन औरतों के बीच एक मैली-कुचैली बूढ़ी, जिसकी कमर समय ने झुका दी थी, लाठी के सहारे खड़ी अत्यंत धीमी आवाज में खरखराई—
‘तुम दोनों कलट्टर की कोठी पे जाके बैठ जाओ. अन्न-जल छोड़ दो. गांधी बाबा ने फिरंगियों को इसी तरह भगाया था.’
‘अरे, यह भिखारिन कैसा उल्टा पाठ पढ़ा रही है.’ कई औरतें चिल्लाईं, ‘चल भाग यहां से!’
प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से

Monday, November 1, 2010

रिश्ते

जब वह कमरे में दाखिल हुई तो उसने दिन-भर के आफिस वाले बोझ और परेशानी को चेहरे पर पानी के छींटे डालकर धोया और तौलिये से सुखा डाला. इस तात्कालिक ताजगी वह उमंग से उसने स्टोव जलाया और फ्राईपैन में चाय के अंदाज से पानी डालकर कुछ गुनगुनाने लगी. स्टोव की आवाज सुनकर सामने लैटी मां कराहने लगी—
‘कैसी हो मां?’ उसने चुलबुले किंतु मायूस अंदाज में पूछा. मां ऐसी बातों का जवाब नहीं दिया करती है, उसे मालूम था.
‘लो मां, चाय. राकेश दवाई दे गया था?’
‘हां!’ मां बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई और अत्यंत पीड़ा से करवट बदलकर नई-नवेली उमंगों से भरपूर लड़की की तरफ देखकर तनिक मुस्कराई भी.
‘अभी उठाती हूं.’ कहते ही उसने मां को धीरे उठाकर कमर में कई तकिये लगा दिए.
वह सोचने लगी उस बीमारी के बारे में जो मां को न जिंदा रखना चाहती है, और न मरने देती है. सारा घर दवाई, इंजेक्शन और कैप्सूल की खाली शीशियों से भरता जा रहा था.
‘राकेश पर्चा रख गया है, वहां तेरी अलमारी में.’ मां धीरे-से काफी देर में कह पाती है. पर्चा पढ़ते ही उसके चेहरे पर लाज भरी मुस्कान फैल गई. आज कितने दिनों के बाद राकेश रात को रुकेगा.
‘ये बातें तुम मेरे सामने कह सकते थे, पर्चे में लिखने की क्या जरूरत थी!’ वह कुछ हल्के मूड में थी.
‘ठीक है, मैं कमाता नहीं हूं पर अभी इतनी हैसियत तो है कि दवाई ला सकूं. तुम्हारी तो सारी तनख्वाह ही दवाई में चली जाती है. पार्टी-पाॅलिटिक्स ने मुझे न घर का रखा है, न बाहर का. फिर भी तुमने इस नाकारा को. जिसे लोग आवारा और शराबी कहते हैं. अम्मा जी की सेवा करने का मौका दिया, यह क्या कम है?’ ऐसे अंदाज पर वह मुस्कराकर रह जाती है.
जीरो वाट का बल्ब जल रहा है. एक ख्याल उसे मां की बीमारी से ज्यादा भयानक लगता है, जो रोज रात को परेशान करता है. उसका गला सूखने लगा. पास रखी सुराही को देखकर वह तृष्णा लिए उठी और बराबर के पार्टीशन में गई.
खटोले पर सोया राकेश, ढाढ़ी भरा चेहरा. सीने के बटन खुले हुए. उससे चार वर्ष छोटा. क्या लगता है उसका? सब कुछ तो लगता है उसका. वही है अब उसकी जिंदगी. उसके जी में आया कि वह झकझोरकर कहे—
‘राकेश तुम मुझे अपना लो. मैं टूट रही हूं. मां ठीक नहीं होगी....मां ठीक नहीं होगी.
‘क्या बात है दीदी?’ राकेश हड़बड़ाकर जाग गया. उसने परेशान अरुणा के चेहरे को पसीने से तर-बतर पाया.
‘कुछ नहीं रे, तू सो जा. मां की दवाई का टाइम हो गया है न...’ और वह पलट पड़ी.
प्रस्तुति: विनायक
‘कदम-कदम पर हादसे’ से